Saturday, October 17, 2009

बादल को घिरते देखा है (Badal ko Ghirte Dekha hai) by Nagarjun

"Badal Ko Ghirte Dekha Hai" --- A poem by Nagarjun.

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों ले आ-आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा-काल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान् सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

दुर्गम बर्फानी घाटी में
शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल-
के पीछे धावित हो-होकर
तरल-तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
कहाँ गय धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत किन्तु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल
मुखरित देवदारु कनन में,
शोणित धवल भोज पत्रों से
छाई हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगंधित
फूलों की कुंतल को साजे,
इंद्रनील की माला डाले
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
शतदल लाल कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि खचित कलामय
पान पात्र द्राक्षासव पूरित
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चंदन की त्रिपटी पर,
नरम निदाग बाल कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

Initial line have a quality description of the himalaya mountain. Manasarovar is a lake on himalaya it is one of the highest lake in world. It is also pilgrimage attraction for hindu religion.
I have tried to explain some relatively hard terms.
धवल(dhawal) - clean तुहिन(tuheen) - very small
तुंग(tung)- mountain श्यामल नील - slightly blue (blueish)
सलिल(saleel) - water पावस(pawas) - summer
उमस(umas) - heat बिसतंतु(bistantu) : snake
तिरत(tirate) - swimming बालारुण(balarun) : morning sun
स्वर्णाभ शिखर(swarnav shikhar) - at sunrise mountain peaks looks gold-is colored
विरहित(virahit) - separated चिर-अभिशापित(chir avishapit) : cursed for long
झंझानिल : storm + rain

चकवा-चकई : a type of bird which can’t be with it’s mate during night. As explained in poem they are cursed somehow so they can’t be together in night.
शत-सहस(shat shahastra): 100 k
उन्मादक(unmadak) : something thak make you feal excited, insane.
It is really taking a lot of time better I will explain some good para.

कस्तूरी मृग (musk deer): As said by poet it has musk inside it’s nave and it is very pleasant smelling. Due to this pleasant smell the deer tries to search for it’s origin. Since the deer is always able to smell it but is never able to find it, so it is teased by itself.

कहाँ गय धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
. . . .
Poet then tries to search for Kuber(God of Money) and his Alka puri(a city fool of money, gold etc) which is thought to be situated near manasarovar as told by kalidas.
It also explains kalidas’s meghdoot and ganga which flows in sky it says that he is not able find it so he says further that it is only poets thinking and not reality.

6 comments:

  1. this is one of my fav poems frm my hindi textbuk........thanx for brnging it back........the beauty of these words always brngs 2 mind a lovely n fulfilling picture.........u hav a gud taste in poems since i find that most of d poems u hv posted belong 2 alist of my fav.........

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  2. This is really awesome poem whenever i miss hind i use to read this poem... :)

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  3. bistantu means thing got in lotus' stem not snake and tuhin is snow or ice

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  4. A correction.. As far as I can remember, it was यायावर not छायामय

    कौन बताए वह यायावर
    बरस पड़ा होगा न यहीं पर

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  5. hey, Nandan, will you please help me to find out any books/books related to references & summary of poems. its urgent.

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